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Afghanistan: Threat Of Biggest Refugee Crisis On The World, Fears Of Increasing Burden On India – अफगानिस्तान: दुनिया पर सबसे बड़े शरणार्थी संकट का खतरा पैदा, भारत पर भी बोझ बढ़ने की आशंका


सार

  .अब तक 550,000 लोग अपने घरों से विस्थापित
  .जुलाई से अब तक 1,26,000 लोगों का पलायन 
  .27 लाख लोग पाकिस्तान, ईरान, यूरोप की शरण में
  .करीब 30 हजार अफगानी हर रोज छोड़ रहे देश

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जैसे ही 15 अगस्त को तालिबान काबुल पहुंचा, अफगानिस्तान में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपना अपना शहर-अपना घर छोड़कर भागने लगे हैं। अपने देश से निकलने के लिए खौफजदा हो गए लोग प्लेन के पहियों तक पर लटक गए। जिसे जहां जो जगह मिल रही या जो गुंजाइश बन रही वह उधर ही भाग रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अफगानिस्तान से होने वाले पलयान का चेहरा कितना विभत्स होने वाला है। विस्थापन का सबसे ज्यादा दुख महिलाएं और बच्चों को झेलना पड़ रहा है। 

दुनियाभर के देश काबुल में अपना दूतावास खाली कर रहे हैं। सभी देश अपने नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने के मिशन पर हैं। भारत भी अपने नागरिकों की वतन वापसी करा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंगलवार को उच्च स्तरीय बैठक में अफगानिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी सुनिश्चित करने और वहां से भारत आने के इच्छुक सिखों और हिंदुओं को शरण देने का निर्देश दिया है। 

अलग-अलग देशों में पनाह ले रहे अफगान नागरिक
अफगान नागरिकों का अपने देश से पलायन जारी है। वे अलग-अलग देशों में पनाह ले रहे हैं। बीते सप्ताह में अब तक कई बड़े अफगानी नेता और सांसद भारत पहुंच चुके हैं। वर्दक के सांसद वहीदुल्लाह कलीमजई, अब्दुल अजीज हकीमी, अब्दुल कादिर जजई, मालेम लाला गुल, अफगानिस्तान के उच्च सदन के वरिष्ठ सलाहकार समेत करीब 12 सांसद और नेताओं ने भारत में शरण ली है। अफगान मुख्य वार्ताकार अब्दुल्ला अब्दुल्ला का परिवार वर्तमान में भारत में रहता है और पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई जैसे अन्य लोग देश में रह चुके हैं और अध्ययन कर चुके हैं।

करीब 30 हजार अफगानी हर रोज छोड़ रहे देश 
ऐसे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए शरणार्थियों का बड़ा संकट पैदा होने वाला है। अमेरिकी मीडिया का अनुमान है कि पिछले दस दिनों के दौरान हर दिन करीब 30 हजार अफगानी देश छोड़ रहे हैं। ज्यादातर लोग पैदल या सड़क मार्ग से होते हुए सीमावर्ती पाकिस्तान, ईरान और अल्बानिया की ओर जा रहे हैं। कुछ लोग भारत की तरफ बढ़ रहे हैं।

कई और देशों ने अफगानी नागरिकों के लिए अपने देश की सीमाएं खोल दी है। हालांकि तालिबान के डर से उज्बेकिस्तान अफगानी नागरिकों को अपने यहां घुसने नहीं दे रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमा पर बने फ्रेंडशिप ब्रिज पर बड़ी तादाद में लोग पहुंच गए हैं जिन्हें वहां से लौटाया जा रहा है।

कितना बड़ा संकट
पहले चार बार विस्थापन के बुरे दौर से गुजरने के बाद अफगान नागिरकों को पांचवीं बार अपना घर छोड़कर कहीं और शरण लेना पड़ रहा है। इस साल की शुरुआत में जैसे ही तालिबान ने अफगानिस्तान के ग्रामीण इलाकों पर कब्जा करना शुरू किया, हजारों लोग भागकर काबुल आने को मजबूर हुए। 

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी यूनाईटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी के अनुसार, इस वर्ष की शुरुआत से अब तक  550,000 लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। जिनमें आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे थे। 27 लाख लोग पाकिस्तान, ईरान और यूरोप की शरण ले चुके हैं। 90 फीसदी शरणार्थी पाकिस्तान और ईरान पहुंच चुके हैं। जबकि 25 लाख लोग देश में ही बेघर हो गए हैं। केवल जुलाई से नौ अगस्त के बीच 1,26,000 लोग विस्थापित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी यूनाईटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी बार-बार चेता रहा है कि अफगानिस्तान के मानवीय संकट पर दुनिया को चिंता करने की जरूरत है।

संकट के और गहराने की आशंका
अफगानिस्तान को पहले ही दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी माना जाता रहा है। अब यह समझा जा रहा है कि जैसे-जैसे तालिबान अपनी हुकूमत चलाएगा यह संकट और गहराता जाएगा। इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने इन हालातों को देखते हुए मानवीय आधार पर सभी देशों से इस संकट को सुलझाने की अपील की है।  

भारत पर असर क्या
1980 के दशक में अफगान गृह युद्ध के दौरान भागकर आए कई शरणार्थियों अभी भी दिल्ली की झुग्गियों में रहते हैं। माना जा रहा है कि हजारों की संख्या में अफगानी नागरिक फिर भारत की शरण ले सकते हैं। भारत सरकार ने भी शरणार्थियों को हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है। सरकार ने मंगलवार को भारत आने की इच्छा रखने वाले अफगान नागरिकों की अर्जियों पर जल्द फैसलों के लिए वीजा की नई श्रेणी की घोषणा की है। पिछले कुछ हफ्तों में काबुल में भारतीय वीजा के लिए अनुरोधों में इजाफा देखा गया है। 

हालांकि अफगानिस्तान से शरणार्थियों के आने पर भारत पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। भारत पहले से दो लाख से ज्यादा शरणार्थियों का घर है, जिनमें तिब्बत,बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार के नागरिक संघर्ष और युद्ध पीड़ित शामिल हैं। तिब्बत के कुछ शरणार्थी, जो 1959 से 1962 के बीच भारत आए, उन्हें भारत सरकार ने 38 से अधिक बस्तियों में बसाया।

2019 में तिब्बती शरणार्थियों की संख्या 73,404 थी। इन शरणार्थियों को शैक्षिक सुविधाओं के उपयोग और पंजीकरण प्रमाणपत्र की सुविधा दी गई। मतदान के अधिकार को छोड़कर भारतीय नागरिकों को मिलने वाली हर सुविधा उन्हें मिली। 59,506 श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी तमिलनाडु और ओडिशा में 108 शिविरों में रह रहे हैं। भारत में 13 हजार से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी यूएनएचसीआर से पंजीकृत हैं। 
 

भारत के पास नहीं है शरणार्थी नीति
भारत ने अब तक 1951 की संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि और 1967 के उस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जो शरणार्थियों की रक्षा करने के लिए राष्ट्रों की कानूनी बाध्यता को परिभाषित करते हैं। भारत में शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के बावजूद, शरणार्थियों की समस्या के समाधान के लिए न तो कोई विशिष्ट कानून है और न कोई राष्ट्रीय शरणार्थी नीति। इसके पीछे का डर यह है कि शरणार्थी कानून लागू करना, मतलब पड़ोसी देशों के शरणार्थियों के लिए दरवाजा खोलने के समान है। 1951 के शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं करने के लिए पीछे भारत का तर्क यह है कि

ठोस नीति नहीं होने का साफ अर्थ है शरणार्थियों को स्वीकार करना या अस्वीकार करना। यह पूरी तरह से उस राजनीतिक दल की नीतियों पर निर्भर होता है जिसकी केंद्र में सत्ता होती है। जैसे 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर सरकार की नीति सख्त हो गई है। दरअसल शरणार्थी मुद्दा राज्य के लिए एक समस्या है क्योंकि इससे आर्थिक बोझ पड़ता है, जनसंख्या बढ़ती है और सुरक्षा का जोखिम भी पैदा होता है। हालांकि यह इस तथ्य के बावजूद भारत ने अपने 75 साल के इतिहास में लाखों शरणार्थियों की मेजबानी की है। भारत में विदेशी लोगों और संस्कृति को आत्मसात करने की नैतिक परंपरा रही है।

बांग्लादेश पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता प्रदान करने के लिए सरकार ने 2019 में नागरिकता संशोधन कानून भी बनाया है, लेकिन इसके लिए जरूरी नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है। शरणार्थियों की देखभाल करना मानवाधिकार का मुख्य पहलू है। इसके अलावा यह माना जाता है कि आर्थिक, जातीय और धार्मिक संदर्भों को देखते हुए, भारत में शरणार्थियों का प्रवेश रोकने की जल्द कोई संभावना नहीं है।

दुनिया के चार बड़े शरणार्थी संकट 
अफगानिस्तान से पहले कई देशों में सत्ता पलटने या गृह युद्ध के हालात पैदा होने के कारण कई देशों के नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ी। इन शरणार्थियों को कैंपों में रहकर गुजारा करना पड़ रहा है। ऐसे ही चार बड़े शरणार्थी संकट के बारे में जानिए।
 
सीरिया– 2011 में यहां युद्ध शुरू होने के बाद 66 लाख सीरियाई नागरिकों को जबरन अपना देश छोड़ना पड़ा। कोरोना महामारी के दौरान इन शरणार्थियों की हालात और खराब हो गई है। 

सोमालिया– सोमालिया में लगभग ढाई दशकों के सशस्त्र संघर्ष,  सूखे और अन्य प्राकृतिक खतरों के कारण करीब 10 लाख सोमलियन नागरिकों को अफ्रीका और यमन के शरणार्थी कैंपों में रहना पड़ रहा है। 

म्यंमार– भारी हिंसा के कारण 2017 में 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान देश छोड़कर बांग्लादेश और पाकिस्तान की शरण ले चुके हैं। 25 अगस्त 2017 से 742,000 से अधिक शरणार्थी बांग्लादेश भाग गए हैं। वे चोरी-छुपे भारत में भी प्रवेश कर रहे हैं। 

दक्षिणी सूडान– यह अफ्रीका का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट रहा। बढ़ती हिंसा और बिगड़ती परिस्थितियों के बीच, दक्षिण सूडान में स्थिति पूरी तरह से मानवीय आपातकाल में बदल गई। करीब 22 लाख लोग पड़ोसी देशों में भाग चुके हैं। 40 लाख लोग अपने ही देश में बेघर हैं।

 

 

विस्तार

जैसे ही 15 अगस्त को तालिबान काबुल पहुंचा, अफगानिस्तान में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपना अपना शहर-अपना घर छोड़कर भागने लगे हैं। अपने देश से निकलने के लिए खौफजदा हो गए लोग प्लेन के पहियों तक पर लटक गए। जिसे जहां जो जगह मिल रही या जो गुंजाइश बन रही वह उधर ही भाग रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अफगानिस्तान से होने वाले पलयान का चेहरा कितना विभत्स होने वाला है। विस्थापन का सबसे ज्यादा दुख महिलाएं और बच्चों को झेलना पड़ रहा है। 

दुनियाभर के देश काबुल में अपना दूतावास खाली कर रहे हैं। सभी देश अपने नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने के मिशन पर हैं। भारत भी अपने नागरिकों की वतन वापसी करा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मंगलवार को उच्च स्तरीय बैठक में अफगानिस्तान में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी सुनिश्चित करने और वहां से भारत आने के इच्छुक सिखों और हिंदुओं को शरण देने का निर्देश दिया है। 

अलग-अलग देशों में पनाह ले रहे अफगान नागरिक

अफगान नागरिकों का अपने देश से पलायन जारी है। वे अलग-अलग देशों में पनाह ले रहे हैं। बीते सप्ताह में अब तक कई बड़े अफगानी नेता और सांसद भारत पहुंच चुके हैं। वर्दक के सांसद वहीदुल्लाह कलीमजई, अब्दुल अजीज हकीमी, अब्दुल कादिर जजई, मालेम लाला गुल, अफगानिस्तान के उच्च सदन के वरिष्ठ सलाहकार समेत करीब 12 सांसद और नेताओं ने भारत में शरण ली है। अफगान मुख्य वार्ताकार अब्दुल्ला अब्दुल्ला का परिवार वर्तमान में भारत में रहता है और पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई जैसे अन्य लोग देश में रह चुके हैं और अध्ययन कर चुके हैं।

करीब 30 हजार अफगानी हर रोज छोड़ रहे देश 

ऐसे में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए शरणार्थियों का बड़ा संकट पैदा होने वाला है। अमेरिकी मीडिया का अनुमान है कि पिछले दस दिनों के दौरान हर दिन करीब 30 हजार अफगानी देश छोड़ रहे हैं। ज्यादातर लोग पैदल या सड़क मार्ग से होते हुए सीमावर्ती पाकिस्तान, ईरान और अल्बानिया की ओर जा रहे हैं। कुछ लोग भारत की तरफ बढ़ रहे हैं।

कई और देशों ने अफगानी नागरिकों के लिए अपने देश की सीमाएं खोल दी है। हालांकि तालिबान के डर से उज्बेकिस्तान अफगानी नागरिकों को अपने यहां घुसने नहीं दे रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमा पर बने फ्रेंडशिप ब्रिज पर बड़ी तादाद में लोग पहुंच गए हैं जिन्हें वहां से लौटाया जा रहा है।



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